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kalyankumar


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शासन कहें या कुशासन !

Posted On: 23 May, 2010  
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निंदनीय है हिंसा और हिंसक विचार

Posted On: 22 May, 2010  
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सरकार दायित्व तो निभाए

Posted On: 22 May, 2010  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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एक पत्थर जरा तबीयत से उछालो यारों…

Posted On: 21 May, 2010  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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ये जनविद्रोह है

Posted On: 21 May, 2010  
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क्या ऐसे ही चलेंगी ट्रेनें?-कल्याण कुमार, बरेली

Posted On: 17 May, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

आपने अपना मौनव्रत तोडा, इसके लिए अति कृतज्ञ हूँ. माओवाद के विरुद्ध लड़ाइ को हमें तीन स्तरों पर लड़ना पड़ेगा. पहले तो बंदूकधारी हिंसक माओवादी जो विकास को अवरुद्ध कर रहे हैं उनसे निपटना होगा. प्रभावित क्षेत्रों में विकास की गति को तीव्र करना होगा और उसमें लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना होगा. तीसरे हमें विचारधारा की लड़ाई जीतनी होगी. प्रभावित क्षेत्रों में लोगों का विश्वास जीतना होगा. उन्हें समझाना पड़ेगा कि माओवाद एक नृशंस, घृणित और अमानवीय विचारधारा है. अगर तीनों कार्य एकसाथ हो सकें तो बेहतर होगा. आपकी सोच के विपरीत मैं किशन जी और कोबाद गाँधी को पढ़ा लिखा और आदर्श नहीं मानता. माओवादी अपने खुद के दुश्मन हैं. जितना ही ये हिंसा का सहारा लेंगे, उतनी ही इनके विरुद्ध नफ़रत बढ़ती जायेगी. अगर माओवादी अपने को इतना ही लोकप्रिय मानते हैं तो चुनाव लड़ कर क्यों नहीं देख लेते. सारे भ्रम का निवारण हो जाएगा. भारत में सत्ता प्राप्त करने का रास्ता बैलट बाक्स से होकर जाएगा बन्दूक की नली से नहीं

के द्वारा:

कल्याण जी, इतने संवेदनशील मुद्दे पर लिखने से पहले तनिक सोच लिया कीजिये. अकेले दंतेवाडा में एक ही हमले में हमारे ७५ जवान चारों ओर से घेर कर भून दिए गए. विचारक महोदय हमारे सैनिकों के शवों पर नक्सलियों के लिए कसीदे पढ़ने का साहस आप जैसे तथाकथित चिन्तक ही कर सकते हैं. अच्छा होता कि आप अपने उदार विचारों को और ज्यादा बढ़ाने की कोशिश तब कर रहे होते जब उन ७५ शहीदों में कोई एक आपका अपना पुत्र होता. जब आपको तथाकथित जनविद्रोहियों कि गोलियों से क्षत विक्षत अपने बेटे कि लाश अपने कंधे पर ढोनी पड़ती तो आप का ये लेख वास्तव में सराहनीय होता. आगे से आप ध्यान देंगे ऐसा मेरा मानना है. वैसे आप कितने तगड़े चिन्तक हैं इस बात का पता ब्लॉग में लिखी प्रतिक्रियाओं को देख कर ही लग गया . किसी भी प्रतिक्रिया का जवाब नहीं दे सके आप. लानत है ऐसे विचारों पर.

के द्वारा:

आपने देशद्रोह को ' जन विद्रोह ' बना दिया. इसका क्या मतलब निकाला जाय. जहाँ भी ' जन ' जैसे शब्द आते हैं जैसे ' जनवादी ' वहाँ मेरा माथा ठनकता है. इसमें मुझे धोखाधड़ी की बू आती है. आपके इखाने का अंदाज़ कुछ ऐसा था मानो मओवादीए तानाशाही के स्थापित होते ही रातों रात सभी समस्याओं का अंत हो जाएगा. माओवादी विकास के दुश्मन हैं. ये विकास के चिन्हों को ही लक्ष्य बनाते हैं. फिर आपने माओवाद की विभीषिका पर भी मौन साध लिया. यह लड़ाई विचारधारा की लड़ाई है. . माओवादी हिंसक विचारधारा के उद्देश्यों के प्रति हमें जनता को सचेत करना होगा. माओवादियों का अभी तक जो हिंसक आचरण रहा है उसके परिपेक्ष्य में देश में माओवादियों के प्रति इतनी नफ़रत है, जिसका आप अंदाज़ नहीं लगा सकते.

के द्वारा:

वही ढाक के तीन पात. आपने अपने पिछले पोस्ट ' जन विद्रोह ' की बातों को ही दुहराया है. कोई नई बात नहीं कही. टिप्पणियों में जो बातें कही गईं उस पर आपने मौन धारण कर लिया है. गरीबी, भुखमरी, बीमारी, शोषण, अत्याचार, गैर बराबरी हमारी मूलभूत समस्याएं हैं. इनसे हम अपने लोकतान्त्रिक तरीके से संघर्ष कर रहे हैं, और कुछ आंशिक सफलता भी मिली है. टिप्पणियों में प्रश्न यह उठाये गए थे कि क्या माओवादी तानाशाही लोकतंत्र का विकल्प है. हमारी समस्याओं का माओवादियों के पास क्या समाधान है. क्या स्कूल, सड़क, अस्पताल, बस, ट्रेन, विद्युत् उत्पादन केंद्र बम से उड़ाने से सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा. अगर ऐसा है तो यह तो बड़ा आसान तरीका है. अपने माओवादियों को कह दीजिये कि सभी कुछ बम से उड़ा दें. सभी समस्याओं का ' माओवादी हल ' निकल आएगा. माओवादी तालिबानी तरीके से जो गरीब लोगों की नृशंस हत्या करते हैं, उसपर भी आप मौन हैं. आप कहते हैं कि क्या माओवादी इतने ज्यादा हैं कि लोगों को आतंकित कर सकते हैं. हाँ, एक बंदूकधारी गुंडा गाँव भर को आतंकित कर सकता है. ज्यादा संख्या की आवश्यकता नहीं होती है. खालिस्तानी आन्दोलन के समय कुछ गिने चुने लोगों ने पूरे प्रदेश को आतंकित कर रखा था. ये कुछ प्रश्न हैं जो अनुत्तरित हैं और चीख चीख कर उत्तर मांग रहे हैं.

के द्वारा:

आप का यह लेख सार्थक है जिसमें सही तथ्यों को रेखांकित किया गया है. आपका पिछला लेख सच को सामने ला पाने में असमर्थ रहा जिसका मुझे खेद है. यह बिलकुल सच है कि देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि ये वाकई नाकारा साबित हो चुके हैं. नेता शब्द जिस देश में आज गाली मानी जाती हो और कोई भी व्यक्ति अपने बच्चों से नेता बनने को नहीं कह सकता हो तो स्थिति जगजाहिर है. जिन देशद्रोहियों को जेल के सींखचों के पीछे होना चाहिए वे हमारे लिए कानून बना रहे हैं. लेकिन इतना होने के बावजूद भी किसी भी ऐसी गतिविधि को मान्यता नहीं मिलनी जिससे अंततः देश ही खतरे में आ जाए. सबको पता है कि आज कई ऐसे नेता और प्रशासनिक अफसर तथा बुद्धिजीवी हैं जो आतंकवादी नक्सलियों से मिले हुए हैं इसलिए हमें ज्यादा कोशिश उन्हें बेनकाब करने की होनी चाहिए ना कि नक्सलियों के किसी कृत्य का समर्थन करने की. हमें जनता को ये भी बताना होगा कि हमारे दुश्मन किस तरह आदिवासियों के शोषण की झूठी तस्वीर पेश कर नक्सलियों के लिए सहानुभूति का वातावरण तैयार करते हैं. ये प्रपंची बुद्धिजीवी हमारी युवा आबादी को बरगला कर उन्हें भी देशद्रोहियों को माफ़ कर देने की मानसिकता सिखा डाल रहे हैं. यानी भविष्य में ये युवा इतनी कमजोर क्षमता के हो जाएँगे कि कोई भी भारत के खिलाफ कुछ भी कर गुजरेगा. आज अंध राष्ट्रवाद की जरूरत है देश को.

के द्वारा:

आप कहते हैं कि सख्ती से कहीं कोई जनविद्रोह काबू हुआ है? देशद्रोहियों के समर्थन में बात कर आप क्रांतिकारी बनना चाहते हैं. जिन्हें मानव के दर्द से कोई सरोकार नहीं वे सिखा रहे हैं कि दर्द क्या होता है. नक्सली आतंकी अपने खिलाफ जाने वालों को सबके सामने बोटी-बोटी काट डालते हैं, बड़ी ही भयानक और खौफनाक मौत का इंतजाम करते हैं. जो उनकी बात नहीं मानता उसके घर वालों का अपहरण कर घर की लड़कियों-औरतों के बेरहमी से बलात्कार करते हैं. आप इसे इंसानियत का धर बता रहे हैं? आप जैसे लोग नक्सल व्यापार में शामिल होकर सिर्फ लाभ कमाने को सोचते हैं. यह ना तो जनयुद्ध है और ना ही कोई क्रांतिकारी आन्दोलन. देशद्रोही किसी का नहीं होता. ऐसे छद्म बुद्धिजीवियों को अंततः जनता ही सबक सिखाएगी.

के द्वारा:

सर, आपके विचार से सहमत होना कोई बहुत मुश्किल नहीं है। दर असल जो इन इलाकों में नहीं गए हैं। समस्या का असली पहलू पता ही नहीं है। वे अखबारों में छपी खबरों के अनुसार अपनी राय बनाते हैं। विज्ञान का एक सिद्धांत है जो वस्तु जिस गति से दबाई जाती है अवसर पाते ही उसी गति से उछलती है। आप इसे नक्सली कहें, माओवाद कहें या और कुछ इस हिंसा के पीछे अभाव, शोषण, पीढ़ा, भूखमरी की अंतहीन त्रासदी है। और यह सारी स्थितियां हमें क्रांति की ओर ही ले जाती हैं। यह बहस तो बेमानी है कि यह जनक्रांति है या नहीं। यदि हम अपने बच्चों को उचित माहौल नहीं दे सके तो दोष किसका है। और कांटा जरूर कांटे से निकलता लेकिन गंदगी गंदगी से साफ नहीं होती। इसका हमें ध्यान रखना होगा 

के द्वारा:

कल्याण जी,किसी तरह की अशांति का इलाज़ हथियार नहीं है तो किसी समस्या का भी समाधान हथियार नहीं है,ये आप नक्सलियों को क्यों नहीं समझाते?यही तो दुर्भाग्य है कि लालू ,ममता और दिग्विजय सिंह जैसे नेता राजनीतिक लाभ के लिए इनके हिमायती है और अगर वास्तव में ये लोग हितैषी हैं तो विकास का काम उन क्षेत्रों में करने से इन्हें रोका किसने था?हरेक घर/व्यवस्था मैं कमियां होती हैं तो क्या उनका फायदा उठाकर दुश्मनों को देश तोड़ने की इज़ाज़त देनी चाहिए?आप कहते हैं कि नक्सली आम जनता को नहीं मारते तो क्या बसों में आम जनता सफ़र नहीं करती?नक्सली विकास के सारे चिन्ह यथा स्कूल ,सड़क,पुल,अन्य इमारतें नष्ट करने में लगे हैं तो कैसा और किस तरह का विकास चाहते हैं ये?झारखण्ड में तो आदिवासी मुख्यमंत्री रहे हैं जैसे मधु कोड़ा शिबू सोरेन जो कि भ्रस्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं,कल्याण जी नक्सली माओवाद से भ्रमित देशद्रोही बीज हैं जिन्हें राजनीतिक फायदे के लिए टुच्चे नेता,प्रचार के लिए आप जैसे लेखक सींचकर पेड़ बना रहे हैं,लोकतंत्र में हिंसा की क्या जगह?और फिर हिंसा का जवाब तो सख्ती ही है,यही वो नेता हैं जो देश तोड़ने के लिए जाति आधारित जनगणना का बीज बो रहे हैं,अगर भूखे को रोटी और बेरोजगार को काम चाहिए तो उसमे जाति कहाँ से आ गयी?जरूरत है [१]दुश्मन देशो के मोहरे हथियारबंद माओवादियों को गरीब,भोली-भली आदिवासी लोगो से अलग करके ख़त्म करने की,आप कहते हैं की नक्सली 7 राज्यों मैं सक्रिय हैं और इनका प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है तो कैंसर का इलाज नहीं होगा तो वो तो बढेगा ही,[२]पिछड़े इलाकों मैं विकास के इमानदार प्रयास की,कल्याण जी माओवाद में किसी dissent view को accept नहीं किया जाता, आप लोग जैसे लोग जो इतना गाल बजा रहे हैं वो भी लोकतंत्र के कारण ही है,घंडी और किशनजी होंगे पढ़े-लिखे लेकिन ज्ञान का उपयोग विकास में भी हो सकता है और विनाश में भी,परमाणु से बिजली भी बनती है और हथियार भी,लेकिन आप जैसे लोग अपने ज्ञान और क्षमता का उपयोग राष्ट्र निर्माण में नहीं करके बिघटन में कर रहे हैं,माओवादी विकास का वैकल्पिक मॉडल क्यों नहीं देते अगर ये देशभक्त हैं तो,किशन जी,घंडी या आप मैं से कोई क्यों नहीं गाँधी और बिनोवा नहीं बनता? ये देश का दुर्भाग्य है कि इसको नेता आज़ादी के बाद गंदे ही मिले,देश कि मालिक जनता है वोही जगे तो देश बचे, अगर भूखे को भोजन,अशिक्षित को शिक्षा,बेरोजगारों को काम कि मांग माओवाद है तो में भी वोही हूँ,लेकिन अभी जो हो रहा है हिंसक तरीके से निर्दोष लोगो को मारकर उसका इलाज़ तो surgery ही है,

के द्वारा:

नक्सली हिंसा को जन विद्रोह कहना जनता का घोर अपमान है. जन से इनका दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है. ये लोग जनता को आतंकित कर अपने कब्जे में रखकर / उनको बंधक बनाकर उनका समर्थन हासिल करना चाहते हैं. नक्सलीओं को ये पता है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में माओवाद जैसी हिंसक विचारधारा के लिए कोई स्थान नहीं है. इनको मालूम है कि लोकतांत्रिक तरीके से नक्सली कभी भी जनता का विश्वास नहीं जीत सकते. इस कारण ये आतंक का सहारा लेते हैं. इनका उद्देश्य है आतंक और हिंसा के सहारे लोकतंत्र के स्थान पर माओवादी ताआशाही स्थापित करना. जो लोग तालिबानी शैली में इन्स्पेक्टर फ्रैंसिस इन्दुवर का सर धड से अलग करते हैं, 76 सी आर पी ऍफ़ जवानों की हत्या करते हैं, स्कूलों, अस्पतालों, पुलों, रेल, विद्युत् उत्पादन केन्द्रों, सडकों को बम से उड़ाते हैं, उनके कुकृत्यों को आप जन विद्रोह कहते हैं. निश्चय ही आपने जन विद्रोह की कोई नई परिभाषा बनाई होगी. माओवादी आतंक की तुलना फ्रांस की राज्यक्रान्ति से करना बेमतलब है. फ्रांस की राज्य क्रान्ति आतताई राजा के विरुद्ध जन कल्याण के लिए हुई थी. हमारे यहाँ जनता द्वारा चुनी हुई लोकप्रिय सरकार है. नक्सवादी कभी भी लोकप्रियता हासिल नहीं कर सकते. इसी कारन ये आतंक का रास्ता अपनाते हैं. ये लोग जन हितैषी नहीं, जन विरोधी हैं. देशद्रोही हैं. किशन जी और कोबाद गाँधी को आप नेता मानते हैं. इन सभी का काम चम्बल के डाकुओं जैसा ही है.

के द्वारा:




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